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Wednesday, 9 August 2017

कर्म योग द्वारा सर्व सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं


🔵 यदि तुम व्यापारी या दुकानदार हो तो यह समझो कि मेरा यह व्यापार धन कमाने के लिये नहीं है श्री भगवान की पूजा करने के लिये है। लोभवृत्ति से जिन जिन के साथ तुम्हारा व्यवहार हो इन्हें लाभ पहुंचाते हुये अपनी आजीविका चलाने मात्र के लिये व्यापार करो। याद रखो- व्यापार में पाप लोभ से ही होता है। लोभ छोड़ दोगे तो किसी प्रकार से भी दूसरे का हक मारने की चेष्टा नहीं होगी।

🔴 वस्तुओं का तोल-नाप या गिनती कभी ज्यादा लेना और कम देना बढ़िया के बदले घटिया देना और घटिया के बदले बढ़िया लेना आढ़ती दलाली वगैरह हमें शर्त से ज्यादा लेना आदि व्यापारिक चोरियाँ लोभ से ही होती हैं। परन्तु केवल लोभ ही नहीं छोड़ना है, दूसरों के हित की भी चेष्टा करनी है। जैसे लोभी मनुष्य अपनी दुकान पर किसी ग्राहक के आने पर उसका बनावटी आदर सत्कार करके उससे ठगने की चेष्टा करते हैं, वैसे ही तुम्हें कपट छोड़कर ग्राहक को प्रेम के साथ सरल भाषा में सच्ची बात समझा कर उसका हित देखना चाहिए।

🔵 यह समझना चाहिये कि इस ग्राहक के रूप में साक्षात् परमात्मा ही आ गये हैं। इनकी जो कुछ सेवा मुझसे बन पड़े वही थोड़ी है। यों समझ कर व्यापार करोगे तो तुम श्री भगवान के कृपा पात्र बन जाओगे और यह व्यापार ही तुम्हारे लिए भगवन् प्राप्ति का साधन बन जायेगा।

🔴 यदि तुम दलाल हो तो व्यापारियों को झूँठी सच्ची बातें समझाकर अपनी दलाली के लोभ से किसी को ठगाओ मत। दोनों के रूप में ईश्वर के दर्शन कर सत्य और सरल वाणी से दोनों की सेवा करने की चेष्टा करो। याद रखो! अभी नहीं तो आगे चलकर तुम्हारी इस वृत्ति का लोगों पर बहुत प्रभाव पड़ेगा यदि न भी पड़े तो कोई हर्ज नहीं है, तुम्हारी मुक्ति का साधन तो हो ही जायेगा।