Showing posts with label महाभारत. Show all posts
Showing posts with label महाभारत. Show all posts

Friday, 13 November 2015

विनम्रता- महाभारतका प्रसंग है ।

धर्मयुद्ध अपने अंतिम चरणमें था ।
भीष्म पितामह शैय्यापर लेटे जीवनकी अंतिम घडियां गिन रहे थे । उन्हें इच्छा मृत्युका वरदान प्राप्त था और वे सूर्यके दक्षिणायनसे उत्तरायण होनेकी प्रतीक्षा कर रहे थे । धर्मराज युधिष्ठिर जानते थे कि पितामह उच्च कोटिके ज्ञान और जीवन संबंधी अनुभवसे संपन्न हैं । अतएव वे अपने भाइयों और पत्नी सहित उनके समक्ष पहुंचे और उनसे विनती की-
पितामह,”आप विदाकी इस बेलामें हमें जीवनके लिए उपयोगी ऐसी शिक्षा दें, जो  सदैव हमारा मार्गदर्शन करे ।“
तब भीष्मने बडा ही उपयोगी जीवन दर्शन समझाया । नदी जब समुद्र तक पहुंचती है, तो अपने जलके प्रवाहके साथ बडे-बडे वृक्षोंको भी बहाकर ले आती है । एक दिन समुद्रने नदीसे प्रश्न किया,”तुम्हारा जलप्रवाह इतना शक्तिशाली है कि उसमें बडे-बडे वृक्ष भी बहकर आ जाते हैं । तुम पलभरमें उन्हें कहांसे कहां ले आती हो ? किंतु क्या कारण है कि छोटी व हल्की घास, कोमल बेलों और नम्र पौधोंको बहाकर नहीं ला पाती । नदीका उत्तर था जब-जब मेरे जलका बहाव आता है, तब बेलें झुक जाती हैं और उसे मार्ग दे देती हैं; किंतु वृक्ष अपनी कठोरताके कारण यह नहीं कर पाते, इसलिए मेरा प्रवाह उन्हें बहा ले आता है।
इस छोटेसे उदाहरणसे हमें सीखना चाहिए कि जीवनमें सदैव विनम्र रहें तभी व्यक्तिका अस्तित्त्व बना रहता है । सभी पांडवोंने भीष्मके इस उपदेशको ध्यानसे सुनकर अपने आचरणमें उतारा और सुखी हो  गए ।
साधना हेतु बताए गए विषय-बिन्दु भी इसी प्रकार हैं । यदि इन्हें जीवनमें उतारा जाए तो ही इनका लाभ हमें प्राप्त होता है अन्यथा जिस प्रकार धनागारमें धन रखा हो और कोई व्यक्ति उस धनका विपत्ति अथवा आवश्यकताके समय उपयोग ही न कर सके तो वह धन किस काम का ? इसी प्रकार अध्यात्मकी शिक्षा भी यदि कृतिमें नहीं उतरे तो उसका क्या लाभ ?

Tuesday, 3 November 2015

अनूठी भक्ति

महाभारत युद्ध के बाद भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन द्वारिका गए. इस बार रथ अर्जुन चलाकर ले गए. . 
द्वारिका पहुंचकर अर्जुन बहुत थक गए थे इसलिए विश्राम करने अतिथिभवन में चले गए. . 
संध्या को रूक्मिणीजी ने श्रीकृष्ण को भोजन परोसा. 
प्रभु रूक्मिणीजी से बोले- प्रिय घर में अतिथि आए हुए हैं. हम अतिथि को भोजन कराए बिना भोजन कैसे ग्रहण कर लूं. . 
रूक्मिणीजी ने कहा- भगवन आप भोजन आरंभ तो करिए मैं अर्जुन को अभी बुलाकर लिए आती हूं. . 
रूक्मिणीजी जब अतिथिकक्ष में पहुंची तो वहां अर्जुन गहरी नींद में सो रहे थे. रूक्मिणीजी यह देखकर आश्चर्य में थीं कि नींद में सोए अर्जुन के रोम-रोम से श्रीकृष्ण नाम की ध्वनि निकल रही है. . यह देख रूक्मिणी अर्जुन को जगाना भूल आनंद में डूब गईं और धीमे-धीमे ताली बजाने लगीं. . 
प्रभु के दर्शन के लिए नारदजी पहुंचे तो देखा प्रभु के सामने भोग की थाली रखी है और वह प्रतीक्षा में बैठे हैं. 
नारदजी ने श्रीकृष्ण से कहा- भगवन भोग ठण्डा हो रहा है, इसे ग्रहण क्यों नहीं करते. . 
श्रीकृष्ण बोले- नारदजी, बिना अतिथि को भोजन कराए कैसे ग्रहण करूं. नारदजी ने सोचा कि प्रभु को अतिथि की प्रतीक्षा में विलंब हो रहा है. इसलिए बोले- प्रभु मैं स्वयं बुला लाता हूं आपके अतिथि को. . 
नारदजी भी अतिथिशाला की ओर चल पड़े. वहां पहुंचे तो देखा अर्जुन सो रहे हैं. उनके रोम- रोम से श्रीकृष्ण नाम की ध्वनि सुनकर देवी रूक्मिणी आनंद विभोर ताली बजा रही हैं. प्रभुनाम के रस में विभोर नारदजी ने वीणा बजानी शुरू कर दी. . 
सत्यभामाजी प्रभु के पास पहुंची. प्रभु तो प्रतीक्षा में बैठे हैं. 
सत्यभामाजी ने कहा- प्रभु भोग ठण्डा हो रहा है प्रारंभ तो करिए. भगवान ने फिर से वही बात कही- हम अतिथि के बिना भोजन नहीं कर सकते. . 
अब सत्यभामाजी अतिथि को बुलाने के लिए चलीं. वहां पहुंचकर सोए हुए अर्जुन के रोम-रोम द्वारा किए जा रहे श्रीकृष्ण नाम के कीर्तन, रूक्मिणीजी की ताली, नारदजी की वीणा सुनी तो वह भी भूल गईं कि आखिर किस लिए आई थीं. . 
सत्यभामाजी ने तो आनंद में भरकर नाचना शुरू कर दिया. 
प्रभु प्रतीक्षा में ही रहे. जो जाता वह लौट कर ही न आता. . प्रभु को अर्जुन की चिंता हुई सो वह स्वयं चले. प्रभु पहुंचे अतिथिशाला तो देखा कि स्वरलहरी चल रही है. . 
अर्जुन निद्रावस्था में कीर्तन कर रहे हैं, 
रूक्मिणी जाग्रत अवस्था में उनका साथ दे रही हैं, 
नारद जी ने संगीत छेड़ी है 
तो सत्यभामा नृत्य ही कर रही हैं. . 
यह देखकर भगवान के नेत्र सजल हो गये. प्रभु ने अर्जुन के चरण दबाना शुरू कर दिया. . प्रभु के नेत्रों से प्रेमाश्रुओ की कुछ बूंदें अर्जुन के चरणों पर पड़ी तो अर्जुन वेदना से छटपटा कर उठ बैठे. 
जो देखा उसे देखकर हतप्रभ तो होना ही था. घबराए अर्जुन ने पूछा- प्रभु यह क्या हो रहा है ! . 
भगवान बोले- अर्जुन तुमने मुझे रोम-रोम में बसा रखा है इसीलिए तो तुम मुझे सबसे अधिक प्रिय हो. 
गोविन्द ने अर्जुन को गले से लगा लिया. अर्जुन के नेत्रों से अश्रु की धारा फूंट रही थी. . कुछ बूंदें सौभाग्य की, कुछ प्रेम की और कुछ उस अभिमान की जो भक्त को भगवान के लिए हो ही जाती है. ****************************** कुछ कथाएं तब उमड़ती है जब भक्त अपने आराध्य की भक्ति में लीन हो जाता है. 
वह कथाएं सभी दूसरी कथाओं से ज्यादा आनंद प्रदान करती है. . 
बोलिये भक्त की जय, भक्तवत्सल भगवान की जय। . जय जय श्री राधे"