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Wednesday, 15 June 2016
मान-अपमान में सम रहें
Monday, 23 November 2015
जीवन के 5 सत्य:-
1. कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितने खूबसूरत हैं
क्योंकि..लँगूर और गोरिल्ला भी अपनी ओर लोगों का ध्यान आकर्षित कर लेते हैं..
2. कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपका शरीर कितना विशाल और मज़बूत है
क्योंकि...श्मशान तक आप अपने आपको नहीं ले जा सकते....
3. आप कितने भी लम्बे क्यों न हों
मगर आने वाले कल को आप नहीं देख सकते....
4. कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपकी त्वचा कितनी गोरी और चमकदार है
क्योंकि...अँधेरे में रोशनी की जरूरत पड़ती ही है...
5. कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितने अमीर हैं और दर्जनों गाड़ियाँ आपके पास है
क्योंकि...घर के बाथरूम तक आपको चल के ही जाना पड़ेगा...
Friday, 13 November 2015
सतकर्म में लगाओ प्रभु के गुणगान में कीर्तन में लगाओ तो ही सार्थक है जीवन
जैसे यम के पुकारने पर जीवात्मा शरीर से बहार आ जाती है वैसे जब तक भगवान
कृपा न करे तब तक हमको भक्ति की प्राप्ति नहीं होती और भक्ति प्रकाशित नही
होती अंदर सुसुप्तावस्था में पड़ी रहती है और आत्मबोध नही होता।
.
एक बहुत बड़ा आश्रम था उसके महंथ जी बहुत विद्वान थे।हजारो संत वहाँ रहते कथा चलती सतसंग होता कीर्तन होता भगवत् पूजा भी होती आतिथ्य भी होता।
अब हुआ ये के उनमें से एक महात्मा जी का देहान्त हो गया।अब वो संत जब की मृत्योपरान्त उनका शव पड़ा है सामने और सब संत रो रहे है हाय रे ये तो मर गये हाय रे ये तो मर गए।लेकिन महंत जी मुस्कुरा रहे है।सबने महंत जी से कहा के आपको जरा भी करुणा नही आ रही बेचारे महात्मा जी चले गए !
महंत जी ने कहा ये बताओ ये जीवित कब थे ?
तो बोले 5 मिनट पहले अभी जीवित थे और अब मर गए..
महंत जी ने कहा अच्छा जी ये बताओ आपने मरने वाले को देखा है ?
तो संत बोले गोरे गोरे से थे साढ़े 3 हाथ के थे लंबी जटायें थी बड़ी बड़ी दाढ़ी थी।
तो महंत जी बोले वो तो सामने पड़ा है फिर रोते क्यों हो ?
फिर बोले अरे महाराज हम उसके लिए रोते है जो इसमें से निकल के चला गया तो फिर बोले वही तो पूछ रहा हूँ तुमको मालूम है कैसा था ?
फिर बोले गोर गोर थे साढ़े 3 हाथ के थे लंबी जटायें थी बड़ी बड़ी दाढ़ी थी।
तो महंत बोले अरे वो गोरा भी साढ़े 3 हाथ का भी लंबी दाढ़ी भी सब तुम्हारे सामने पड़ा है फिर रोते क्यों हो भाई ?
बोले अजी हम उसके लिए रो रहे है जो निकल गया तो बोले निकलने वाले को ही पूछ रहे है तुमने देखा है कैसा था ?
.
हज़ार उदहारण देकर भी हम नही बता सकते वो कैसा था ?
जैसे चूल्हे पर बर्तन में हम पानी को रख देते है तो पानी गर्म हो जाता है तो प्रसन्नता होती है लेकिन घण्टे दो घण्टे बाद अग्नि को निचे से निकल दिया तो पानी वापस ठण्डा हो जाता है।अब हम यदि इसके लिए दुखी हो के पानी ठंडा हो गया तो यह तो नसमझी है।पानी तो तब तक गरम रहेगा जब तक उसको अग्नि गरम करती रहेगी।
ऐसे ही शरीर को मरण धर्मा नाम दिया गया है शस्त्रों में।सिवाय मरने के शरीर कोई दूसरा काम करता ही नही है।
.
गीता में गोविन्द कहते है..
"जातस्य ही ध्रुवोमृत्यु ध्रुवंजन्ममृत्स्य च ।"
.
जिस दिन से हम जन्म लेते है मरना उसी दिन से प्रारम्भ होता है।
ये मौत हमारे शरीर के साथ जन्म लेती है।शरीर का काम ही है मरना एक एक दिन शरीर मर ही तो रहा है ।पर ये सारी प्रक्रियाएँ शरीर की है मेरी नहीं है।क्यों की मैं तो शरीर हूँ ही नही तो देह का अभिमान कैसा ?
भैया प्रभु ने बहुत बड़ी कृपा की है की मानव देह दिया है।
तो इसको सतकर्म में लगाओ प्रभु के गुणगान में कीर्तन में लगाओ तो ही सार्थक है जीवन।
एक बहुत बड़ा आश्रम था उसके महंथ जी बहुत विद्वान थे।हजारो संत वहाँ रहते कथा चलती सतसंग होता कीर्तन होता भगवत् पूजा भी होती आतिथ्य भी होता।
अब हुआ ये के उनमें से एक महात्मा जी का देहान्त हो गया।अब वो संत जब की मृत्योपरान्त उनका शव पड़ा है सामने और सब संत रो रहे है हाय रे ये तो मर गये हाय रे ये तो मर गए।लेकिन महंत जी मुस्कुरा रहे है।सबने महंत जी से कहा के आपको जरा भी करुणा नही आ रही बेचारे महात्मा जी चले गए !
महंत जी ने कहा ये बताओ ये जीवित कब थे ?
तो बोले 5 मिनट पहले अभी जीवित थे और अब मर गए..
महंत जी ने कहा अच्छा जी ये बताओ आपने मरने वाले को देखा है ?
तो संत बोले गोरे गोरे से थे साढ़े 3 हाथ के थे लंबी जटायें थी बड़ी बड़ी दाढ़ी थी।
तो महंत जी बोले वो तो सामने पड़ा है फिर रोते क्यों हो ?
फिर बोले अरे महाराज हम उसके लिए रोते है जो इसमें से निकल के चला गया तो फिर बोले वही तो पूछ रहा हूँ तुमको मालूम है कैसा था ?
फिर बोले गोर गोर थे साढ़े 3 हाथ के थे लंबी जटायें थी बड़ी बड़ी दाढ़ी थी।
तो महंत बोले अरे वो गोरा भी साढ़े 3 हाथ का भी लंबी दाढ़ी भी सब तुम्हारे सामने पड़ा है फिर रोते क्यों हो भाई ?
बोले अजी हम उसके लिए रो रहे है जो निकल गया तो बोले निकलने वाले को ही पूछ रहे है तुमने देखा है कैसा था ?
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हज़ार उदहारण देकर भी हम नही बता सकते वो कैसा था ?
जैसे चूल्हे पर बर्तन में हम पानी को रख देते है तो पानी गर्म हो जाता है तो प्रसन्नता होती है लेकिन घण्टे दो घण्टे बाद अग्नि को निचे से निकल दिया तो पानी वापस ठण्डा हो जाता है।अब हम यदि इसके लिए दुखी हो के पानी ठंडा हो गया तो यह तो नसमझी है।पानी तो तब तक गरम रहेगा जब तक उसको अग्नि गरम करती रहेगी।
ऐसे ही शरीर को मरण धर्मा नाम दिया गया है शस्त्रों में।सिवाय मरने के शरीर कोई दूसरा काम करता ही नही है।
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गीता में गोविन्द कहते है..
"जातस्य ही ध्रुवोमृत्यु ध्रुवंजन्ममृत्स्य च ।"
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जिस दिन से हम जन्म लेते है मरना उसी दिन से प्रारम्भ होता है।
ये मौत हमारे शरीर के साथ जन्म लेती है।शरीर का काम ही है मरना एक एक दिन शरीर मर ही तो रहा है ।पर ये सारी प्रक्रियाएँ शरीर की है मेरी नहीं है।क्यों की मैं तो शरीर हूँ ही नही तो देह का अभिमान कैसा ?
भैया प्रभु ने बहुत बड़ी कृपा की है की मानव देह दिया है।
तो इसको सतकर्म में लगाओ प्रभु के गुणगान में कीर्तन में लगाओ तो ही सार्थक है जीवन।
Saturday, 31 October 2015
सुखी जीवन का रहस्य:-
सुखी जीवन का रहस्य:-
एक बार यूनान के मशहूर दार्शनिक सुकरात भ्रमण करते हुए एक नगर
में गए। वहां उनकी मुलाकात एक वृद्ध सज्जन से हुई, दोनों आपस में काफी घुलमिल गए। वृद्ध सज्जन आग्रहपूर्वक सुकरात को अपने
निवास पर ले गए। भरा-पूरा परिवार था उनका, घर में बहु-बेटे, पौत्र-पौत्रियां
सभी थे।
सुकरात ने बुजुर्ग से पूछा- “आपके घर में तो सुख-समृद्धि का वास है। वैसे अब आप करते क्या हैं?"
इस पर वृद्ध ने कहा- “अब मुझे कुछ नहीं करना पड़ता। ईश्वर की दया से हमारा अच्छा कारोबार है, जिसकी सारी जिम्मेदारियां अब बेटों को सौंप दी हैं। घर
की व्यवस्था हमारी बहुएं संभालती हैं। इसी तरह जीवन चल रहा है।"
यह सुनकर सुकरात बोले- "किन्तु इस वृद्धावस्था में भी
आपको कुछ तो करना ही पड़ता होगा। आप बताइए कि बुढ़ापे में आपके इस सुखी जीवन का
रहस्य क्या है?"
वह वृद्ध सज्जन मुस्कराए और बोले- “मैंने अपने जीवन के इस मोड़ पर एक ही नीति को अपनाया
है कि दूसरों से ज्यादा अपेक्षाएं मत पालो और जो मिले, उसमें संतुष्ट रहो। मैं और मेरी पत्नी अपने पारिवारिक
उत्तरदायित्व अपने बेटे-बहुओं को सौंपकर निश्चिंत हैं। अब वे जो कहते हैं, वह मैं कर देता हूं और जो कुछ भी खिलाते हैं, खा लेता हूं। अपने पौत्र- पौत्रियों के साथ
हंसता-खेलता हूं। मेरे बच्चे जब कुछ भूल करते हैं, तब भी मैं चुप रहता हूं। मैं उनके किसी कार्य में बाधक नहीं बनता। पर जब
कभी वे मेरे पास सलाह-मशविरे के लिए आते हैं तो मैं अपने जीवन के सारे अनुभवों को
उनके सामने रखते हुए उनके द्वारा की गई भूल से उत्पन्न् दुष्परिणामों की ओर सचेत
कर देता हूं। अब वे मेरी सलाह पर कितना अमल करते या नहीं करते हैं, यह देखना और अपना मन व्यथित करना मेरा काम नहीं है। वे
मेरे निर्देशों पर चलें ही, मेरा यह आग्रह नहीं
होता। परामर्श देने के बाद भी यदि वे भूल करते हैं तो मैं चिंतित नहीं होता। उस पर
भी यदि वे मेरे पास पुन: आते हैं तो मैं पुन: नेक सलाह देकर उन्हें विदा करता
हूं।"
बुजुर्ग सज्जन की यह बात सुनकर सुकरात बहुत प्रसन्न हुए।
उन्होंने कहा- “इस आयु में जीवन
कैसे जिया जाए, यह आपने बखूबी समझ
लिया है।"
Saturday, 24 October 2015
मानव जीवन का लक्ष्य
नदी में हाथी की लाश बही जा रही थी। एक कौए ने लाश देखी, तो
प्रसन्न हो उठा, तुरंत उस पर आ बैठा। यथेष्ट मांस खाया। नदी का जल पिया। उस
लाश पर इधर-उधर फुदकते हुए कौए ने परम तृप्ति की डकार ली। वह सोचने लगा,
अहा! यह तो अत्यंत सुंदर यान है, यहां भोजन और जल की भी कमी नहीं। फिर इसे
छोड़कर अन्यत्र क्यों भटकता फिरूं?
कौआ नदी के साथ बहने वाली उस लाश के ऊपर कई दिनों तक रमता
रहा। भूख लगने पर वह लाश को नोचकर खा लेता, प्यास लगने पर नदी का पानी पी
लेता। अगाध जलराशि, उसका तेज प्रवाह, किनारे पर दूर-दूर तक फैले प्रकृति के
मनोहरी दृश्य-इन्हें देख-देखकर वह विभोर होता रहा।
नदी एक दिन आखिर महासागर में मिली। वह मुदित थी कि उसे अपना
गंतव्य प्राप्त हुआ। सागर से मिलना ही उसका चरम लक्ष्य था, किंतु उस दिन
लक्ष्यहीन कौए की तो बड़ी दुर्गति हो गई। चार दिन की मौज-मस्ती ने उसे ऐसी
जगह ला पटका था, जहां उसके लिए न भोजन था, न पेयजल और न ही कोई आश्रय। सब
ओर सीमाहीन अनंत खारी जल-राशि तरंगायित हो रही थी।
कौआ थका-हारा और भूखा-प्यासा कुछ दिन तक तो चारों दिशाओं में
पंख फटकारता रहा, अपनी छिछली और टेढ़ी-मेढ़ी उड़ानों से झूठा रौब फैलाता
रहा, किंतु महासागर का ओर-छोर उसे कहीं नजर नहीं आया। आखिरकार थककर, दुख से
कातर होकर वह सागर की उन्हीं गगनचुंबी लहरों में गिर गया। एक विशाल
मगरमच्छ उसे निगल गया।
शारीरिक सुख में लिप्त मनुष्यों की भी गति उसी कौए की तरह
होती है, जो आहार और आश्रय को ही परम गति मानते हैं और अंत में अनन्त संसार
रूपी सागर में समा जाते है।
जीत किसके लिए, हार किसके लिए
ज़िंदगीभर ये तकरार किसके लिए....
ज़िंदगीभर ये तकरार किसके लिए....
जो भी आया है वो जायेगा एक दिन
फिर ये इतना अहंकार किसके लिए.
फिर ये इतना अहंकार किसके लिए.
अंधेरे में अपनी छाया साथ नहीं देती...
बुढा़पे में अपनी काया साथ नहीं देती ।
सारा जीवन दाव पर लगा दीया जीसके लीए
अन्त समय वो धन-माया साथ नहीं देती ।
अन्त समय वो धन-माया साथ नहीं देती ।
Monday, 19 October 2015
एक कहानी जो आपके जीवन से जुडी है ।
ध्यान से अवश्य पढ़ें--
एक अतिश्रेष्ठ व्यक्ति थे एक दिन उनके पास एक निर्धन आदमी आया और बोला की मुझे अपना खेत कुछ साल के लिये उधार दे दीजिये ,मैं उसमें खेती करूँगा और खेती करके कमाई करूँगा |
वह अतिश्रेष्ठ व्यक्ति बहुत दयालु थे |
उन्होंने उस निर्धन व्यक्ति को अपना खेत दे दिया और साथ में पांच किसान भी सहायता के रूप में खेती करने को दिये और कहा की इन पांच किसानों को साथ में लेकर खेती करो, खेती करने में आसानी होगी, इस से तुम और अच्छी फसल की खेती करके कमाई कर पाओगे।
वो निर्धन आदमी ये देख के बहुत खुश हुआ की उसको उधार में खेत भी मिल गया और साथ में पांच सहायक किसान भी मिल गये। लेकिन वो आदमी अपनी इस ख़ुशी में बहुत खो गया,और वह पांच किसान अपनी मर्ज़ी से खेती करने लगे और वह निर्धन आदमी अपनी ख़ुशी में डूबा रहा, और जब फसल काटने का समय आया तो देखा की फसलबहुत ही ख़राब हुई थी , उन पांच किसानो ने खेत का उपयोगअच्छे से नहीं किया था न ही अच्छे बीज डाले ,जिससे फसल अच्छी हो सके | जब वह अतिश्रेष्ठ दयालु व्यक्ति ने अपना खेत वापस माँगा तो वह निर्धन व्यक्ति रोता हुआ बोला कि मैं बर्बाद हो गया , मैं अपनी ख़ुशी में डूबा रहा और इन पांच किसानो को नियंत्रण में न रख सका न ही इनसे अच्छी खेती करवा सका।
वह अतिश्रेष्ठ व्यक्ति बहुत दयालु थे |
उन्होंने उस निर्धन व्यक्ति को अपना खेत दे दिया और साथ में पांच किसान भी सहायता के रूप में खेती करने को दिये और कहा की इन पांच किसानों को साथ में लेकर खेती करो, खेती करने में आसानी होगी, इस से तुम और अच्छी फसल की खेती करके कमाई कर पाओगे।
वो निर्धन आदमी ये देख के बहुत खुश हुआ की उसको उधार में खेत भी मिल गया और साथ में पांच सहायक किसान भी मिल गये। लेकिन वो आदमी अपनी इस ख़ुशी में बहुत खो गया,और वह पांच किसान अपनी मर्ज़ी से खेती करने लगे और वह निर्धन आदमी अपनी ख़ुशी में डूबा रहा, और जब फसल काटने का समय आया तो देखा की फसलबहुत ही ख़राब हुई थी , उन पांच किसानो ने खेत का उपयोगअच्छे से नहीं किया था न ही अच्छे बीज डाले ,जिससे फसल अच्छी हो सके | जब वह अतिश्रेष्ठ दयालु व्यक्ति ने अपना खेत वापस माँगा तो वह निर्धन व्यक्ति रोता हुआ बोला कि मैं बर्बाद हो गया , मैं अपनी ख़ुशी में डूबा रहा और इन पांच किसानो को नियंत्रण में न रख सका न ही इनसे अच्छी खेती करवा सका।
अब यहाँ ध्यान दीजियेगा-
वह अतिश्रेष्ठ दयालु व्यक्ति हैं -''मेरे प्रभु"
निर्धन व्यक्ति हैं -"हम"
खेत है -"हमारा शरीर"
पांच किसान हैं हमारी इन्द्रियां--आँख,कान,नाक,जीभ और मन |
वह अतिश्रेष्ठ दयालु व्यक्ति हैं -''मेरे प्रभु"
निर्धन व्यक्ति हैं -"हम"
खेत है -"हमारा शरीर"
पांच किसान हैं हमारी इन्द्रियां--आँख,कान,नाक,जीभ और मन |
प्रभु ने हमें यह शरीर रुपी खेत अच्छी फसल(कर्म) करने को दिया है और हमें इन पांच किसानो को अर्थात इन्द्रियों को अपने नियंत्रण में रख कर कर्म करने चाहियें , जिससे जब वो दयालु प्रभु जब ये शरीर वापस मांग कर हिसाब करें तो हमें रोना न पड़े।
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