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Friday, 13 November 2015

सतकर्म में लगाओ प्रभु के गुणगान में कीर्तन में लगाओ तो ही सार्थक है जीवन

जैसे यम के पुकारने पर जीवात्मा शरीर से बहार आ जाती है वैसे जब तक भगवान कृपा न करे तब तक हमको भक्ति की प्राप्ति नहीं होती और भक्ति प्रकाशित नही होती अंदर सुसुप्तावस्था में पड़ी रहती है और आत्मबोध नही होता।
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एक बहुत बड़ा आश्रम था उसके महंथ जी बहुत विद्वान थे।हजारो संत वहाँ रहते कथा चलती सतसंग होता कीर्तन होता भगवत् पूजा भी होती आतिथ्य भी होता।
अब हुआ ये के उनमें से एक महात्मा जी का देहान्त हो गया।अब वो संत जब की मृत्योपरान्त उनका शव पड़ा है सामने और सब संत रो रहे है हाय रे ये तो मर गये हाय रे ये तो मर गए।लेकिन महंत जी मुस्कुरा रहे है।सबने महंत जी से कहा के आपको जरा भी करुणा नही आ रही बेचारे महात्मा जी चले गए !
महंत जी ने कहा ये बताओ ये जीवित कब थे ?
तो बोले 5 मिनट पहले अभी जीवित थे और अब मर गए..
महंत जी ने कहा अच्छा जी ये बताओ आपने मरने वाले को देखा है ?
तो संत बोले गोरे गोरे से थे साढ़े 3 हाथ के थे लंबी जटायें थी बड़ी बड़ी दाढ़ी थी।
तो महंत जी बोले वो तो सामने पड़ा है फिर रोते क्यों हो ?
फिर बोले अरे महाराज हम उसके लिए रोते है जो इसमें से निकल के चला गया तो फिर बोले वही तो पूछ रहा हूँ तुमको मालूम है कैसा था ?
फिर बोले गोर गोर थे साढ़े 3 हाथ के थे लंबी जटायें थी बड़ी बड़ी दाढ़ी थी।
तो महंत बोले अरे वो गोरा भी साढ़े 3 हाथ का भी लंबी दाढ़ी भी सब तुम्हारे सामने पड़ा है फिर रोते क्यों हो भाई ?
बोले अजी हम उसके लिए रो रहे है जो निकल गया तो बोले निकलने वाले को ही पूछ रहे है तुमने देखा है कैसा था ?
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हज़ार उदहारण देकर भी हम नही बता सकते वो कैसा था ?
जैसे चूल्हे पर बर्तन में हम पानी को रख देते है तो पानी गर्म हो जाता है तो प्रसन्नता होती है लेकिन घण्टे दो घण्टे बाद अग्नि को निचे से निकल दिया तो पानी वापस ठण्डा हो जाता है।अब हम यदि इसके लिए दुखी हो के पानी ठंडा हो गया तो यह तो नसमझी है।पानी तो तब तक गरम रहेगा जब तक उसको अग्नि गरम करती रहेगी।
ऐसे ही शरीर को मरण धर्मा नाम दिया गया है शस्त्रों में।सिवाय मरने के शरीर कोई दूसरा काम करता ही नही है।
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गीता में गोविन्द कहते है..
"जातस्य ही ध्रुवोमृत्यु ध्रुवंजन्ममृत्स्य च ।"
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जिस दिन से हम जन्म लेते है मरना उसी दिन से प्रारम्भ होता है।
ये मौत हमारे शरीर के साथ जन्म लेती है।शरीर का काम ही है मरना एक एक दिन शरीर मर ही तो रहा है ।पर ये सारी प्रक्रियाएँ शरीर की है मेरी नहीं है।क्यों की मैं तो शरीर हूँ ही नही तो देह का अभिमान कैसा ?
भैया प्रभु ने बहुत बड़ी कृपा की है की मानव देह दिया है।
तो इसको सतकर्म में लगाओ प्रभु के गुणगान में कीर्तन में लगाओ तो ही सार्थक है जीवन।

Saturday, 31 October 2015

सही बात का समर्थन सत्य को शक्ति प्रदान करता है...!!! निंद्रा और कीर्तन


कुम्भकर्ण की पत्नी का नाम निंद्रादेवी हे।निंद्रादेवी जब विधवा होने पर श्री राम चंद्र जी के पास गई और पूछा -की पर्भु अब में कहा जाऊ ??
रामचन्द्र जी ने कहा की वह जहाँ चाहे वहा रह सकती हे। तो निंद्रा देवी ने कहा की मेने निच्छय किया हे जहां आप का कथा - कीर्तन होगा ,,वही जाकर अपना आसन जमाउंगी।पंचप्राण को कान में रख कर कथा सुनो।
एक बार मीरा बाई अन्य भक्तो के साथ कीर्तन कर रही थी। कई लोगो का ताल ठीक नही था।जब शरीर का भान नही रह पाता ।तो ताल की तो बात ही क्या।किसी ने बड़े बड़े अक्षरो में लिखा ""ताल से गाओ ""अगले दिन मीराबाई ने यह पड़ा तो उन्होंने उसे रद्द करके लिखा ""प्रेम से गाओ""कीर्तन में ताल की अपेक्षा प्रेम प्रधान हे ।कीर्तन करने से मन की अशुद्धि धुलती हे और ह्रदय विशुद्ध होता हे ।
कीर्तन तालिया बजा बजा कर करो।पर्भु सभी को देखते हे ।कीर्तन में जो तालिया नही बजाते ;;उसके लिए भगवान सोचते हे की मे मुर्ख ही हु जो मेने इसे दो हाथ दिए किन्तु अगले जन्म में में
 अपनी भूल सुधार लूंगा और इसे दो ओर्र पांव दूंगा।
पर्भु भजन में तालिया बजाने में शर्म क्यों ।पाप से शर्म करो।पाप झरने में हेठी हे।
  जो पर्भु भजन में तालिया बजाने में कतराते हे उसे अगले जन्म में परमात्मा हाथ की जगह दो पाँव और देते हे।इसलिए प्रेम से तालिया बजाकर संकीर्तन करो।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
अंत में
बजाओ राधा नाम की ताली
बजाओ श्याम नाम की ताली
समर्पित-राधायुगलकिशोर सेवा में -हरे कृष्ण भक्ति हट्ट