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Saturday, 19 December 2015

महत्व बुद्धि जिसकी जहाँ , होती

महत्व बुद्धि जिसकी जहाँ , होती " रोटीराम "।
वह व्यक्ति करता वही , अन्य न दूजा काम।।
हाँ ! कुछ दिन रुक जाएगा, कुछ दिन दे भी छोड।
पर महत्व बुद्धि उसे , उधर ही देगी मोड।।
कितना भी रोको उसे , समझा या फटकार।
कर्म के दोष गिनाइये , वह नहीं करे विचार।।
हटा नहीं वह पाएगा , उन कामों से टेक।
महत्व बुद्धि ले छीन सब , उसके बुद्धि - विवेक।।
  अक्सर जब सत्संगी लोग आपस में चर्चा कर रहे होते हैं , तो उनमें एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से चल पडता है कि , आप इस लाइन में कब से हैं , सब एक दूसरे से पूछ ही लेते हैं ।
लेकिन जब जबाव सामने निकल कर आते हैं तो , कई बार वे एक दूसरे का चेहरा बडे आश्चर्य से देखते हैं कि , उनमें से कई भाइयों को 15 से 20 - 25 साल तक सत्संग सुनते , कथाऐं श्रवण करते व धाम वास करते - करते हो गए , और करीब 80 % लोग साल के 1 से लेकर 4 महीने तक धामों में रह कर यह सब कर रहे होते हैं , उनको भी आते - जाते 5 से 25 साल हो गए , लेकिन कोई भी उस स्थिति को प्राप्त नहीं कर पाया , जिसको कि प्राप्त करने को वे यहां आए थे , या आ - जा रहे हैं । जिसकी कि गिनती सच्ची भक्ति में होती है ।
तो तब वहाँ यह प्रश्न पैदा होता है कि , ऐसा क्यों ? हुआ ।
पूछने पर सद्संत जवाब देते हैं कि , ऐसा जीव की महत्व बुद्धि की वजह से होता है ।
ये जो 20 % हैं , इनकी यहां रहते - रहते महत्व बुद्धि ईश्वर से हटकर शरीर में हो जाती है , दो चार साल तक तो सब ठीक चलता है , लेकिन उसके बाद इनके सारे प्रयास धामों की खुली हवा और नदियों के निर्मल जल का सेवन करके शरीर को स्वस्थ रखने तक ही सिमट कर रह जाते है , या फिर बहू बेटों के तानों से बचने तक ।फिर इनकी प्राथमिकता ईश्वर भक्ति नहीं रह जाती । भक्ति फैले तो कैसे ?
और जो ये 80 % हैं , इनकी महत्व बुद्धि होती तो घर - परिवार और व्यापार में ही है , ये तो सीजन की समाप्ति पर बस picnic मनाने के प्रयोजन से आते हैं , और नौकरी पेशा लोग सरकारी छुट्टियों को cash कराने के लिए ।इनकी महत्व बुद्धि जब सत्संग है ही नहीं तो , सत्संग की सीख हृदयस्थ हों तो कैसे ?
भजन तो केवल उसी से होगा , जिसकी महत्व बुद्धि अपने कल्याण में होगी । ज्यादातर तो अपने आप से दुश्मनी ही ठाने होते हैं ।

Tuesday, 27 October 2015

महत्व बुद्धि जिसकी जहाँ , होती

महत्व बुद्धि जिसकी जहाँ , होती " रोटीराम "।
वह व्यक्ति करता वही , अन्य न दूजा काम।।
हाँ ! कुछ दिन रुक जाएगा, कुछ दिन दे भी छोड।
पर महत्व बुद्धि उसे , उधर ही देगी मोड।।
कितना भी रोको उसे , समझा या फटकार।
कर्म के दोष गिनाइये , वह नहीं करे विचार।।
हटा नहीं वह पाएगा , उन कामों से टेक।
महत्व बुद्धि ले छीन सब , उसके बुद्धि - विवेक।।
 

 अक्सर जब सत्संगी लोग आपस में चर्चा कर रहे होते हैं , तो उनमें एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से चल पडता है कि , आप इस लाइन में कब से हैं , सब एक दूसरे से पूछ ही लेते हैं ।
लेकिन जब जबाव सामने निकल कर आते हैं तो , कई बार वे एक दूसरे का चेहरा बडे आश्चर्य से देखते हैं कि , उनमें से कई भाइयों को 15 से 20 - 25 साल तक सत्संग सुनते , कथाऐं श्रवण करते व धाम वास करते - करते हो गए , और करीब 80 % लोग साल के 1 से लेकर 4 महीने तक धामों में रह कर यह सब कर रहे होते हैं , उनको भी आते - जाते 5 से 25 साल हो गए , लेकिन कोई भी उस स्थिति को प्राप्त नहीं कर पाया , जिसको कि प्राप्त करने को वे यहां आए थे , या आ - जा रहे हैं । जिसकी कि गिनती सच्ची भक्ति में होती है ।
तो तब वहाँ यह प्रश्न पैदा होता है कि , ऐसा क्यों ? हुआ । 

पूछने पर सद्संत जवाब देते हैं कि ,
ऐसा जीव की महत्व बुद्धि की वजह से होता है ।
ये जो 20 % हैं , इनकी यहां रहते - रहते महत्व बुद्धि ईश्वर से हटकर शरीर में हो जाती है , दो चार साल तक तो सब ठीक चलता है , लेकिन उसके बाद इनके सारे प्रयास धामों की खुली हवा और नदियों के निर्मल जल का सेवन करके शरीर को स्वस्थ रखने तक ही सिमट कर रह जाते है , या फिर बहू बेटों के तानों से बचने तक । फिर इनकी प्राथमिकता ईश्वर भक्ति नहीं रह जाती । 

भक्ति फैले तो कैसे ? ।
और जो ये 80 % हैं , इनकी महत्व बुद्धि होती तो घर - परिवार और व्यापार में ही है , ये तो सीजन की समाप्ति पर बस picnic मनाने के प्रयोजन से आते हैं , और नौकरी पेशा लोग सरकारी छुट्टियों को cash कराने के लिए । इनकी महत्व बुद्धि जब सत्संग है ही नहीं तो , सत्संग की सीख हृदयस्थ हों तो कैसे ?
भजन तो केवल उसी से होगा , जिसकी महत्व बुद्धि अपने कल्याण में होगी । 

ज्यादातर तो अपने आप से दुश्मनी ही ठाने होते हैं ।

Friday, 9 October 2015

तीन साधन- धन - शारीरिक क्षमता और, प्रभु प्रदत्त बुद्धि - विवेक

हम इन्सान अगर हमें सहज ही उपलब्ध , तीन साधनों ( धन - शारीरिक क्षमता और, प्रभु प्रदत्त बुद्धि - विवेक )
का समुचित इस्तेमाल करलें तो , हमारे जीवन के संवर जाने में कहीं कोई शक की , गुंजाइश दूर - दूर तक दिखाई नहीं देती ।

1 - सहजता से उपलब्ध धन , यानी मेहनत व ईमानदारी की कमाई , को विवेक पूर्वक तरीके से खर्च करें तो , अपने दैनिक खर्च करते हुए भी , कुछ न कुछ सत्कर्म करके , पुण्य कमा ही लेंगे , और अगर नहीं भी तो , कम से कम पाप तो खैर नहीं ही बनेंगे ।

2- अपनी शारीरिक क्षमता का , अगर सही उपयोग करलें तो , सेवा - भलाई और परोपकार , न कर पाने का सवाल ही नहीं उठता , क्योंकि इन तीनों में अहम भूमिका शरीर की ही है , और जब ये तीनों हमसे बनेंगे तो , मन की निर्मलता तो अपने आप ही , दिन दूनी बढती जाएगी ,जो कि अंत में , प्रभु चरणों तक पहुंचा कर ही रहेगी ।
( भगवान राम कहते हैं कि, )
 निर्मल मन जन , सो मोहि पावा ।
मोहि कपट छल - छिद्र न भावा ।।

3 - और अगर बुद्धि - विवेक का , अपनी भलाई के लिए सही उपयोग करलें तो , सारी बुराइयों से बचे ही रहेंगे , न तो हम कुसंग में पडेंगे , और न हमारे बच्चे , पाप कर्मों में लिप्त होने का तो खैर, सवाल ही नहीं उठता ।
चूँकि पाप करने से डरेंगे सो , लिमिट से अधिक संग्रह भी नहीं होगा , जिसको कि लेकर परिवार में कलह हो , और हम वानप्रस्थ की आयु में चैन से , वानप्रस्थ लेकर मौत की तैयारी , करने की स्थिति में भी आजाऐंगे ,फिर बताइये , अपने कल्याण में संशय कैसा ?।