Friday, 16 October 2015

मनुष्य का ह्दय सुख की आशाओं से, सत्ता और समपत्ति की ईच्छाओं से घिरा रहता है सदा...

मनुष्य का ह्दय सुख की आशाओं से, सत्ता और समपत्ति की ईच्छाओं से घिरा रहता है सदा...

किन्तु समान्य रूप से मनुष्य अपने माता-पिता, सन्तानों, भाई-बहन या अपनी पत्नि के साथ उचित व्यवहार ही करता है सदा... कोई अन्यायें नही करता। वो सुख और समपत्ति को समान भागो में बांट कर भोगता है।

क्योकि वो यह जानता है कि उसके सुख का आधार है उसका परिवार... उसके सुख का कारण है उसका परिवार... मनुष्य यह भी जानता है कि उसका सुख सामाज से आता है।

किन्तु वो सामाज के साथ अन्यायें कर लेता है। सामाज का शोषण कर लेता है। क्योकि वो सामाज को अपने सुख का कारण नही मानता। वो सामाज को अपने सुख का साधन मानता है।

भेद है तो (कारण और साधन) में।

किन्तु मनुष्य को जब यह बोध हो जाता है कि सारा संसार परमात्मा का ही रूप है। प्रत्येक जीव परमात्मा का ही अंश है। अर्थात कोई पराया नही... सब अपने हैं , ये सारा संसार अपना ही है, अपना ही परिवार है। तो क्रोध का कोई कारण ही नही रह जाता... सारे संघर्ष, सारा वैर, सारे प्रतिशोध नष्ट हो जाते हैं।

अन्तर में परमात्मा और संसार में एकाकमता... यही धर्म का मूल सिद्धान्त है।

स्वंय विचार कीजिए!!!!

जय श्री कृष्ण

दुनिया हमें वैसी नहीं दिखती जैसी वह हैं, बल्कि वैसे दिखती हैं जैसे हम हैं।

एक संत अपने शिष्य के साथ किसी अजनबी नगर में पहुंचे।
रात हो चुकी थी और वे दोनों सिर छुपाने के लिए किसी आसरे की तलाश में थे।
उन्होंने एक घर का दरवाजा खटखटाया, वह एक धनिक का घर था और अंदर से परिवार का मुखिया निकलकर आया।
वह संकीर्ण वृत्ति का था, उसने कहा - "मैं आपको अपने घर के अंदर तो नहीं ठहरा सकता लेकिन तलघर में हमारा स्टोर बना है।
आप चाहें तो वहां रात को रुक सकते हैं, लेकिन सुबह होते ही आपको जाना होगा।"
वह संत अपने शिष्य के साथ तलघर में ठहर गए।
वहां के कठोर फर्श पर वे सोने की तैयारी कर रहे थे कि तभी संत को दीवार में एक दरार नजर आई।
संत उस दरार के पास पहुंचे और कुछ सोचकर उसे भरने में जुट गए।
शिष्य के कारण पूछने पर संत ने कहा-"चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं।"
अगली रात वे दोनों एक गरीब किसान के घर आसरा मांगने पहुंचे।
किसान और उसकी पत्नी ने प्रेमपूर्वक उनका स्वागत किया।
उनके पास जो कुछ रूखा-सूखा था, वह उन्होंने उन दोनों के साथ बांटकर खाया और फिर उन्हें सोने के लिए अपना बिस्तर दे दिया।
किसान और उसकी पत्नी नीचे फर्श पर सो गए।
सवेरा होने पर संत व उनके शिष्य ने देखा कि किसान और उसकी पत्नी रो रहे थे क्योंकि उनका बैल खेत में मरा पड़ा था।
यह देखकर शिष्य ने संत से कहा- 'गुरुदेव, आपके पास तो कई सिद्धियां हैं, फिर आपने यह क्यों होने दिया?
उस धनिक के पास सब कुछ था, फिर भी आपने उसके तलघर की मरम्मत करके उसकी मदद की, जबकि इस गरीब ने कुछ ना होने के बाद भी हमें इतना सम्मान दिया फिर भी आपने उसके बैल को मरने दिया।"
संत फिर बोले-'चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं।"
उन्होंने आगे कहा- 'उस धनिक के तलघर में दरार से मैंने यह देखा कि उस दीवार के पीछे स्वर्ण का भंडार था।
चूंकि उस घर का मालिक बेहद लोभी और कृपण था, इसलिए मैंने उस दरार को बंद कर दिया, ताकि स्वर्ण भंडार उसके हाथ ना लगे।
इस किसान के घर में हम इसके बिस्तर पर सोए थे।
रात्रि में इस किसान की पत्नी की मौत लिखी थी और जब यमदूत उसके प्राण हरने आए तो मैंने रोक दिया।
चूंकि वे खाली हाथ नहीं जा सकते थे, इसलिए मैंने उनसे किसान के बैल के प्राण ले जाने के लिए कहा।
अब तुम्हीं बताओ, मैंने सही किया या गलत!"
यह सुनकर शिष्य संत के समक्ष नतमस्तक हो गया।
ठीक इसी तरह दुनिया हमें वैसी नहीं दिखती जैसी वह हैं, बल्कि वैसे दिखती हैं जैसे हम हैं।
   राधे राधे

सबसे पहले मैं आपको अपना परिचय दूँ - मैं हूँ पैसा...


मेरा साधारण रूप है, दुर्बल सी काया है, लेकिन मै दुनियाँ को पूनर्व्यवस्थित करने की क्षमता रखता हूँ.
मैं इन्सान का व्यवहार और प्रकृति बदलने की क्षमता रखता हूँ क्योंकि इन्सान मुझे आदर्श मानता हैं.कई लोग अपने व्यवहार को बदल देते है,अपने दोस्तों को धोखा देते है,अपना शरीर बेच देते है यहाँ तक की अपना धर्म छोड़ देते है,सिर्फ मेरे लिए !
मैं नेक भ्रष्ट मे फर्क नही करता, लोग मुझे प्रतिष्ठा के मानक के तौर पर इस्तेमाल करते है कि आदमी अमीर है या गरीब,इज्जतदार है या नही.
मै शैतान नहीं हूँ, लेकीन लोग अक्सर मेरी वजह से गुनाह करते है.
मैं तीसरा व्यक्ति नहीं हूँ, लेकिन मेरी वजह से पति पत्नी आपस मे झगड़ते है.
ये सही है की मैं भगवान नहीं हूँ लेकिन लोग मुझे भगवान की तरह पूजते है यहाँ तक की भगवान को पूजने वाले भी मेरी भक्ति करते है भले ही वो आपको इससे दूर रहने की सलाह देते हैं.
वैसे तो मुझे लोगों की सेवा करनी चाहिये लेकीन लोग मेरे गुलाम बनना चाहते हैं.
मैने कभी किसी के लिए बलिदान नहीं दिया लेकीन कई लोग मेरे लिए अपनी जान दे रहे हैं.
मै याद दिलाना चाहता हूँ कि मैं आपके लिए सब कुछ खरीद सकता हूँ,आपके लिए दवाईयाँ ला सकता हूँ लेकीन आपकी उम्र नहीं बढा सकता.
एक दिन जब भगवान का बुलावा आयेगा तो मै आपके साथ नहीं जाऊँगा बल्कि आपको अपने पाप भुगतने के लिए अकेला छोड दूँगा.और यह स्थिती कभी भी आ सकती है आपको अपने बनाने वाले को खुद ही जवाब देना पडेगा और उसका निर्णय स्वीकारना होगा.
उस समय सर्व शक्तिमान आपका फैसला करेगा और मेरे बारे मे पूछेगा, लेकीन मै आपसे अभी पूछता हूँ "क्या आपने जीवनभर मेरा सही इस्तेमाल किया या आपने मुझे ही भगवान बना दिया ?"
एक अंतिम जानकारी मेरी तरफ से....
मैं " उपर " आपके साथ नहीं जाऊँगा बल्कि आपकी सत्कर्मों की पूंजी ही आपके साथ चलेगी.
मुझे वहाँ मत ढूँढ़ना |
मैं पैसा हूँ.....।।।