Showing posts with label मनुष्य. Show all posts
Showing posts with label मनुष्य. Show all posts

Thursday, 17 December 2015

हम सभी मनुष्य एक कर्मशील प्राणी हैं ,

हम सभी मनुष्य एक कर्मशील प्राणी हैं , हम बिना कर्म किए एक छण भी नहीं रह सकते , यहाँ कर्म से मतलब काम से नहीं , वल्कि क्रिया से है । जैसे कि स्वाँस लेना सहज क्रिया है , पलकें झपकाना सहज क्रिया है । इन दोनों क्रियाओं को करने के लिए हमें अपने स्तर पर कुछ प्रयास नहीं करना होता । वे स्वभावतः होती रहती हैं ।
हमें सावधानी की जरूरत तो अपने सामाजिक - सांसारिक - पारिवारिक व व्यापारिक कर्मो को करने में है । क्योंकि इन कर्मों से ही आगे जाकर हमारा प्रारब्ध यानी भाग्य बनना है । जिन मनुष्यों से ये कर्म बुरे बन जाते हैं , वे चौरासी लाख योनियों में भटकते हैं , रोगी होते हैं और दुखी होते हैं , और जिन मनुष्यों से ये कर्म अच्छे बन जाते हैं , वे मनुष्य योनि में जन्म लेते हैं और सुखी - स्वस्थ और वैभव सम्पन्न ।
हममें से ज्यादातर लोग विधि के इस विधान से परिचित हैं , लेकिन हमसे भूल यह हो जाती है कि , प्रारब्ध से जो सुखी और सम्पन्न हो जाते हैं , वे अभिमान में इस कदर डूब जाते हैं , कि भगवान को ही भुला बैठते हैं , और प्रारब्धावश जो दुखी - दीन - हीन - रोगी होते हैं , वे अपने पूर्व कर्मों को भुला बैठते हैं , जिसका कि परिणाम यह होता है कि , वे भगवान को ही भला बुरा कह कर दोषी ठहराने लगते हैं कि , मैंने उसका क्या ? बिगाडा है , जो मेरे ही पीछे पडा हुआ है ।
जबकि जरूरत इस बात की है कि , सुखी व्यक्ति अपने पुण्यों को याद रखें कि , हमारी यह स्थिति हमारे पूर्व पुण्यों के कारण है , सो इन पुण्यों से अर्जित इस अनुकूलता को इस तरह जाया नहीं करें , और जो व्यक्ति दुःखी और रोगी हैं , वे अपनी भूल मानकर इन्हें तो भोग लें , और आगे के लिए सावधान हो जाएं ।
कर्मों के सात्विक होते ही व्यक्ति अपनी तरफ से बिना भगवान से जुडे ही , स्वतः ही भगवान से जुड जाते हैं , क्योंकि आखिर में हम हैं तो भगवान के अंश ही , और सत भगवान का स्वरूप है । इसके बाद अगर कोई प्रतिकूलता आती भी है , तो वह व्यक्ति अब शिकायत नहीं करेगा, क्योंकि अब उसकी बुद्धि , बृह्म बुद्धि हो चुकी होती है । बृह्म बुद्धि को ही तो सच्ची शरणागति कहा जाता है ।

अपनी इच्छा दो मिला , इच्छा में भगवान।
फिर देखो क्या? मौज है ,तनिक न शक कल्यान।।
होगा वह, जो है लिखा , कुछ नहीं अपने हाथ।
फिर काहे को पीटना , फोकट में सिर - माथ।।
हरि से भी कह दो यही , जो मर्जी प्रभु आप।
जहाँ और जैसे रखो , रह लूँगा चुपचाप।।
चलनी ही नहीं जब मेरी , ना मनमाफिक काम।
तो क्यों ? हो - हल्ला करूँ, मुफ्त में " रोटीराम "।।

Saturday, 28 November 2015

सारी सृष्टि में एक मनुष्य ही ऐसा प्राणी है ,

सारी सृष्टि में एक मनुष्य ही ऐसा प्राणी है ,
जो कि रोता हुआ आता है ,
शिकायतें करता हुआ जीता है ,
हर समय भगवान को ही दोष देता रहता है ,
केवल इसको ही भगवान के द्वारा रचित ,
इस सृष्टि में खोट नजर आता है ,
और एक यही जीव कभी सन्तुष्ट नहीं होता ,
यह हमेशा कभी अपने आप से ,
तो कभी दूसरों से नाराज सा ही दिखाई देता है ,
यह चाहे पच्चास साल जिए  या सौ साल ,
जाता है  असन्तुष्ट सा ही ,
यह प्रभु प्रदत्त बुद्धि और विवेक रूपी ,
उन दो अमोघ वाणों का ,
किसी भी उम्र में इस्तेमाल ही नहीं करता,
जो कि इसको मिली हुई ,
प्रभु की अद्भुत सौगातें हैं ,
जिनके उपयोग से लोक और परलोक सुधरते हैं ,
जो कि इसे अपने अंशी से मिलाने में समर्थ हैं,
जिनके कि उपयोग से , आए भले ही रोता हुआ ,
लेकिन जाएगा हंसता हुआ ही ।
अब तो ऐसा लगने लगा है कि,
यह जीव रोने - पीटने का आदी ही हो गया है ,
इसे गर्भों में लटकने की आदत सी हो गई है,
शायद इसीलिए न तो शास्त्रों की मान रहा है ,
और न सन्तों की ,
एक दूसरे को समझा सब रहे हैं ,
लेकिन समझ कोई भी नहीं रहा ,
हर ओर अनिश्चितता ही अनिश्चितता है ।

Thursday, 22 October 2015

यह पात्र मनुष्य के ह्रदय से बना है

प्रेरणादायक कहानी
******************************
प्राचीन काल में एक राजा का यह नियम था कि वह अनगिनत संन्यासियों को दान देने के बाद ही भोजन ग्रहण करता था. एक दिन नियत समय से पहले ही एक संन्यासी अपना छोटा सा भिक्षापात्र लेकर द्वार पर आ खड़ा हुआ. उसने राजा से कहा – “राजन, यदि संभव हो तो मेरे इस छोटे से पात्र में भी कुछ भी डाल दें.”

याचक के यह शब्द राजा को खटक गए पर वह उसे कुछ भी नहीं कह सकता था. उसने अपने सेवकों से कहा कि उस पात्र को सोने के सिक्कों से भर दिया जाय. जैसे ही उस पात्र में सोने के सिक्के डाले गए, वे उसमें गिरकर गायब हो गए. ऐसा बार-बार हुआ. शाम तक राजा का पूरा खजाना खाली हो गया पर वह पात्र रिक्त ही रहा. अंततः राजा ही याचक स्वरूप हाथ जोड़े आया और उसने संन्यासी से पूछा – “मुझे क्षमा कर दें, मैं समझता था कि मेरे द्वार से कभी कोई खाली हाथ नहीं जा सकता. अब कृपया इस पात्र का रहस्य भी मुझे बताएं. यह कभी भरता क्यों नहीं?”

संन्यासी ने कहा – “यह पात्र मनुष्य के ह्रदय से बना है. इस संसार की कोई वस्तु मनुष्य के ह्रदय को नहीं भर सकती. मनुष्य कितना ही नाम, यश, शक्ति, धन, सौंदर्य, और सुख अर्जित कर ले पर यह हमेशा और की ही मांग करता है. केवल ईश्वरीय प्रेम ही इसे भरने में सक्षम है.”

Friday, 16 October 2015

मनुष्य का ह्दय सुख की आशाओं से, सत्ता और समपत्ति की ईच्छाओं से घिरा रहता है सदा...

मनुष्य का ह्दय सुख की आशाओं से, सत्ता और समपत्ति की ईच्छाओं से घिरा रहता है सदा...

किन्तु समान्य रूप से मनुष्य अपने माता-पिता, सन्तानों, भाई-बहन या अपनी पत्नि के साथ उचित व्यवहार ही करता है सदा... कोई अन्यायें नही करता। वो सुख और समपत्ति को समान भागो में बांट कर भोगता है।

क्योकि वो यह जानता है कि उसके सुख का आधार है उसका परिवार... उसके सुख का कारण है उसका परिवार... मनुष्य यह भी जानता है कि उसका सुख सामाज से आता है।

किन्तु वो सामाज के साथ अन्यायें कर लेता है। सामाज का शोषण कर लेता है। क्योकि वो सामाज को अपने सुख का कारण नही मानता। वो सामाज को अपने सुख का साधन मानता है।

भेद है तो (कारण और साधन) में।

किन्तु मनुष्य को जब यह बोध हो जाता है कि सारा संसार परमात्मा का ही रूप है। प्रत्येक जीव परमात्मा का ही अंश है। अर्थात कोई पराया नही... सब अपने हैं , ये सारा संसार अपना ही है, अपना ही परिवार है। तो क्रोध का कोई कारण ही नही रह जाता... सारे संघर्ष, सारा वैर, सारे प्रतिशोध नष्ट हो जाते हैं।

अन्तर में परमात्मा और संसार में एकाकमता... यही धर्म का मूल सिद्धान्त है।

स्वंय विचार कीजिए!!!!

जय श्री कृष्ण

Friday, 9 October 2015

कबहुँक कर करुणा नर देही , देत ईश बिन हेतु सनेही ।

सारी सृष्टि में एक मनुष्य ही ऐसा प्राणी है ,
जो कि रोता हुआ आता है ,
शिकायतें करता हुआ जीता है ,
और हर समय भगवान . को ही दोष देता रहता है ,
केवल इसको ही भगवान के द्वारा रचित ,
इस सृष्टि में खोट नजर आता है ,
भले ही उसके जीवन में कितनी ही ,
अनुकूलताऐं क्यों न हों , कभी सन्तुष्ट ही नहीं होता ,
यह हमेशा कभी अपने आप से ,
तो कभी दूसरों से नाराज सा ही दिखाई देता है ,
यह चाहे पच्चास साल जिए , या सौ साल ,
जाता है , असन्तुष्ट सा ही ,
यह प्रभु प्रदत्त बुद्धि और विवेक रूपी ,
उन दो अमोघ वाणों का , जो कि सकल सृष्टि में ,
केवल इसी के पास हैं ,
उनका किसी भी उम्र में ,
अपने हित के लिए इस्तेमाल ही नहीं करता,
अगर कभी करता भी है , तो केवल संग्रह के लिए ,
जिसे कि औरों के लिए छोड जाता है ,
और संग ले जाता है , पापों की एक मोटी सी पोटली ,
और फिर चौरासी लाख योनियों में भटकाता फिरता है ,
यह सिलसिला जन्म - जन्मान्तरों से चला आ रहा है ,
कृपा करके भगवान फिर नरयोनि देते हैं ,
कि शायद इस बार मेरा भजन करके मुझे पाले ,
( गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है कि )
कबहुँक कर करुणा नर देही ,
देत ईश बिन हेतु सनेही ।
( मानस - उत्तर ' 44/3 )
मगर इन्सान है कि , जगता ही नहीं ,
अब तो ऐसा लगने लगा है कि,
इसे रोने पीटने में ही रस आने लग गया है ,
इसे गर्भों में लटकने की आदत सी हो गई है,
शायद इसीलिए न तो शास्त्रों को मान दे रहा है ,
और न सन्तों को ।